अपनी सामर्थ्यानुसार उपरोक्त गायत्री का जप करें और देवी अपराजिता का वरदहस्त प्राप्त करें - देवी आपको सदा अजेय और संपन्न रखें। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित आपके साधना हेतु एकदम शुद्धता के साथ हुबहू यहाँ प्रस्तुत है। -
सीधे हाथ में जल लेकर विनियोग करे:
ॐ अपराजिता देवी को नमस्कार है। इस श्री अपराजिता-मन्त्र के वेदव्यास ऋषि हैं। अनुष्टुप छन्द हैं। क्लीं बीजम्, हुं, शक्ति है। और सकलकामना सिद्धि के लिए अपराजिता स्त्रोत के इस मंत्रपाठ का विनियोग करता हूँ (महिलायें करता हूँ के जगह करती हूँ , कहेंगी )।
(जल भूमि पर छोड़ दे)
मारकण्डेय ऋषि ने कहा- हे मुनियो सब सिद्धि देने वाली, असिद्धिसाधिका वैष्णवी अपराजिता देवी के इस स्तोत्र को श्रवण करो ।।
अपराजिता देवी ध्यान
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमोस्त्वनन्ताय सहस्रशीर्षाय क्षीरार्णवशायिनें, शेषभोग - पर्यङ्काय गरुड-वाहनाय अमोघाय अजाय अजिताय मत्स्यकूर्म अपराजिताय पीतवाससे।
वासुदेव-संकर्षण - प्रद्युम्नानिरुद्ध-हयशीर्ष-मत्स्यकूर्म-वराह नृसिंह वामन राम-राम वर-प्रद! नमोस्तुते।
असुर दैत्य-दानव-यक्ष-राक्षस-भूत-प्रेत-पिशाच किन्नर-कूष्माण्ड सिद्ध-योगिनी डाकिनी स्कन्दपुरोगान् ग्रहान्नक्षत्रग्रहांश्चान्यान् हन हन, पच, पच, मथ, मथ विध्वंसय, विध्वंसय, विद्रावय, विद्रावय, चूर्णय चूर्णय शंखेन चक्रेण वज्रेण शूलेन गदया मुशलेन हलेन भस्मीकुरु कुरु स्वाहा।।
ॐ सहस्रवाहो सहस्रप्रहरणायुध जय, जय, विजय, विजय, अजित अमित अपराजित अप्रतिहत सहस्रनेत्र ज्वल, ज्वल, प्रज्वल, प्रज्वल, विश्वरूप, बहुरूप मधुसूदन महावराहच्युत महापुरुष पुरुपोत्तम पद्मनाभ वैकुण्ठानिरुद्ध-नारायण गोविन्द दामोदर हृषीकेश केशव सर्वासुरोत्सादन सर्वमन्त्रप्रभञ्जन, सर्वदेवनमस्कृत सर्वबन्धनविमोचन, सर्वशत्रु वशंकर सर्वाहितप्रमर्दन, सर्वग्रहनिवारण, सर्वरोगप्रशमन, सर्व-पाप- विनाशन, जनार्द्दन नमोस्तु ते स्वाहा।
य इमां अपराजितां परमवैष्णवीं पठति, सिद्धां जपति, सिद्धां स्मरति, सिद्धां महाविद्यां पठति, जपति, स्मरति, शृणोति, धारयति, कीर्तयति वा न तस्याग्निवायुर्वज्रोपलाशनिभयं नववर्षणि भयं, न समुद्रभयं, न ग्रह-भयं न चौर-भयं वा भवेत्।
क्वचिद्रात्र्यन्धकारस्त्रीराजकुविषोपविषगरलवशीकरणविद्वेपोच्चाटनवधवन्धनभयं वा न भवेत्।
ऐतैमन्त्रै: सदाहतैः सिद्धैः संसिद्ध-पूजितः, तद्यथा ॐ नमस्तेस्त्वनघेऽजितेऽपराजिते पठति सिद्धे, पठति सिद्धे, जपति सिद्धे, जपति सिद्धे, स्मरति सिद्धे, महाविद्ये एकादशे उमे ध्रुवे अरुन्धति सावित्रि, गायत्रि, जातवेदसि मानस्तोके सरस्वति धरणि धारिणि सौदामिनी अदिति दिति गौरि गांधारी मातंगी कृष्णे यशोदे सत्यवादिनि ब्रह्मवादिनि कालि कपालि करालनेत्रे संद्योपयाचितकरि-जलगतस्थलगतमंतरिक्षगं वा मां रक्ष रक्ष सर्वभूतेभ्य: सर्वोपद्रवेभ्यः स्वाहा।
यस्याः प्रणश्यते पुष्पं गर्भो वा पतते यदि।
म्रियन्ते बालका यस्याः काकवन्ध्या च या भवेत् ॥
भूर्जपत्रेत्विमां विद्यां लिखित्वा धारयेद्यदि।
एतैर्दोषनं लिप्येत सुभगा पुत्रिणी भवेत् ।।
शस्त्रं वार्यंते ह्येषा समरे काण्डवारिणी।
गुल्मशूलाक्षि-रोगाणां क्षिप्रं नाशयते व्यथाम् ॥
शिरोरोगज्वराणां च नाशिनी सर्वंदेहिनाम् तद्यथा- एकाहिक-द्वयाहिक त्र्याहिक-चातुर्थिकार्धंमासिक-द्वैमासिक-त्रैमासिक-चातुर्मासिकपञ्च-मासिकषाण्मा-सिक वातिक-पैत्तिक, श्लैष्मिक-सान्निपातिक, सततज्वर-विषमज्वराणां नाशिनी सर्वदेहिनां ॐ हर हर कालि सर सर गौरि घम धम विद्ये आले ताले माले गन्धे पच पच विद्ये मथ मथ विद्ये, नाशय पापं, हर दुःस्वप्नं, विनाशय मातः, रजनि सन्ध्ये दुन्दुभि-नादे मानसवेगे शंखिनी चक्रिणी वज्रिणी शूलिनी अपमृत्युविनाशिनी विश्वेश्वरी द्राविड द्राविडि केशवदयिते, पशुपतिसहिते, दुन्दुभिनादे मानसवेगे दुन्दुभि-दमनी शवरि किराती मातंगी ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं हैं ह्रौं ह्रः ॐ ॐ श्रां श्रीं श्रुं श्रैं श्रौं श्रः ॐ क्ष्वौ तुरु तुरु स्वाहा। ॐ ये क्ष्मां द्विषन्ति प्रत्यक्षं परोक्षं वा तान् दम दम मर्दय मर्दंय पातय पातय शोषय शोषय उत्सादय उत्सादय ब्रह्माणि माहेश्वरि।
वैष्णवी वैनायकी कौमारी नारसिंही ऐन्द्री चान्द्री आग्नेयी चामुंडे वारुणि वायव्ये रक्ष रक्ष प्रचण्डविद्ये ॐ इन्द्रोपेन्द्र-भगिनी जये विजये शान्तिपुष्टितुष्टि विवर्द्धनी॥
कामांकुशे कामदुधे सर्वंकामफलप्रदे सर्वंभूतेषु मां प्रियं कुरु कुरु स्वाहा।
ॐ आकर्पिणी आवेशिनी तापिनी, धरणि धारिणी मदोन्मादिनी शोंषिणी सम्मोहिनी महानीले नीलपताके महागौरि महाप्रिये महामान्द्रिका महासौरि महामायूरि आदित्यरश्मिनी जाह्नवी यमघण्टे किलि किलि चिन्तामणि सुरभि सुरोत्पन्ने सर्वं-काम-दुधे यथाभिलषितं कार्यं तन्मे सिध्यतु स्वाहा।
ॐ भूः स्वाहा।
ॐ भुवः स्वाहा।
ॐ स्वः स्वः स्वाहा।
ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा।
ॐ यत एवागतं पापं तत्रैव प्रतिगच्छतु स्वाहा।
ॐ बले बले महाबले असिद्धि-साधिनी स्वाहा ।